Saturday, January 6, 2018

पानी चला गया है मुझसे कई गुना दूर

पानी चला गया है मुझसे दूर
मुझसे कई गुना दूर

वो कस कर भींच लेता था जब कभी
तो नसें सींच जाती थीं  
और मुझे भरते हुए उसका उतरते जाना
एक झरने की तरह था 
जिसके बाद कल-कल निर्मल हर तरफ

सोंचती हूँ
वो अब कहां बहता होगा
मेरी सूखी आँखों में उसके तलाश की एक तस्वीर है
जिसे उलट-पलट कर
किसी भी तरफ से देखने पर
वह बहता हुआ दिखाई नहीं देता   

वह बहता हुआ दिखाई नहीं देता   
कि अब बहने को
एक नितांत अकेलापन है जिसमें
कुछ बेमानी आवाजें टकराती हुई शोर करती हैं
जो बिलकुल हीं बे-पानी है

मैं चाहती हूँ
कि बहुत पीछे छूट गयी इस नदी को
वो वह पहला प्रेम-पत्र फिर भेजे
जिसे लिखते हुए वह पिघल कर पानी हुआ था
और अपनी छींटों से मुस्का दे मुझे 

वो आये
भींचे और फुटाये मुझमें फव्वारे
बहाए मुझे कल-कल 
कि यात्रा पूर्ण हो समंदर तक की 


Saturday, December 30, 2017

कुछ है जो ख़त्म होने को है


वो जो नहीं है अब
और जिसने मंझधार वक्त के किसी छोर पर जाकर
किनारा कर लिया
उसकी गिनती एक में ख़त्म नहीं होती

मुझे नहीं मालूम कितनी आहें भरीं उसने किनारे पे बैठ कर
या नहीं भरीं एक भी
पर मैं तब भी
किनारे की तरफ तेज दौड़ कर जाती लहरों में
उसे छू कर थपथपाना चाहता था
और कहना चाहता था कि रुक जाओ
यह जानते हुए भी कि वक्त की अपनी रवायतें हैं
और यह भी कि वो रुकेगा नहीं 

उसके जाने के साथ
भीतर बहुत सारी चीजों ने  
एक साथ दूर होकर
मुझे मंझधार की उबडूब में छोड़ा 

वह प्यार था या नहीं
यह विवेचना का विषय हो सकता है
पर वह एक नहीं होता है
उसमें कई चीजें एक जगह इकठ्ठा होती हैं
और इसका पता उसके जाने के बाद हीं चलता है 

वो अब नहीं है पर बिलकुल हीं नहीं हो ऐसा नहीं है
उससे जुड़ा हुआ बहुत कुछ अभी भी है
कुछ है जो ख़त्म हो कर उस मंझधार में जीवित है
कुछ है जो खत्म होने को है
और कुछ है जो चलता रहेगा जब तक कि
वो ख़त्म नहीं हो जाता

और कुछ के बारे में यह कहना मुमकिन नहीं
कि वे कब ख़त्म होती है और कब फिर चलने लगती हैं
पर मैं उस समय में डूब कर ख़त्म हो जाने के बावजूद
उसे हीं देखता हूँ जो अब नहीं है

और वो जो अब नहीं है
वो सिर्फ बीता साल नहीं है

और उसकी गिनती एक में खत्म नहीं होती !



Saturday, December 2, 2017

समय उदास होने का एक मौका भर है


समय और कुछ नहीं है
बस उदास होने का मौका है

और ऐसा नहीं है कि
तुम उसे उँगलियों पे गिन के
ख़त्म कर दोगे
वो रहेगा तुम्हारे होने तक
और उसके बाद भी
तुम्हें उदास करने के लिए

वो तुम्हें कभी पीली पत्तियों के मार्फ़त
और कभी टूटते तारों की शक्ल में
किया करेगा उदास
और चाहेगा कि तुम जिरह मत करो
कि तुम उन पत्तियों से अलग हो
जो हर साल पीली होकर
छूट जाती है शाख से

और वो चाहेगा कि तुम इस बात पर गौर करो
कि कल की सुबह जब दुनिया के कुछ लोग सो कर जागेंगे
तो कुछ नहीं भी जागेंगे
और उनकी संख्या हजारों में होगी
और गौर करते हुए उदासियत में रहो

वो चाहता है कि
कोई उसका बेजा इस्तेमाल
अपने मतलब निकालने में ना करे
और बेमतलब दौड़ लगा कर हांफने में
उसे खर्च न किया जाए
बल्कि
फूलती साँसों को ठहर कर देखने और
उसमें इकठ्ठे कार्बन
को घिस-घिस कर
उसके रहते साफ़ कर लिया जाए 

समय और कुछ नहीं है
बस उदास होने का मौका भर है
और वह मौका है बहुत सारे जरूरी
चीजों के बारे में
यह सोंचने का
कि वे दरअसल कितने  जरूरी अथवा गैर-जरूरी हैं

मगर आप चाहें तो
उसे खुश रह कर बर्बाद भी कर सकते हैं!



  

Wednesday, November 22, 2017

मेरा जागना तुम्हारी नींद को चुभता रहे!



मैं जानती हूँ
तुम सो रहे होगे अभी
यह जानते हुए भी
कि मैं जाग रही होउंगी

पर मैं जागती रहा करूंगी 
सिर्फ इसलिए
कि तुम ये जानते हुए सोओ
कि मैं जाग रही होउंगी
और तुम अपनी नींद में भी
मेरे जागने की नोक पर रहो

और कल की एक और सुबह जब
तुम जागो...

तो मैं अपने बिस्तर से उठकर
कैलेंडर की एक और तारीख पर
गोला लगा दूं
कि जिसमें
तुम सोये रहे
यह जानते हुए कि
मैं जाग रही होउंगी
और फिर उन्हें,
उन गोले लगे तारीखों को
कभी नहीं गिनूँ!

मेरा जागना तुम्हारी नींद को चुभता रहे!


Sunday, November 19, 2017

मैं तुम्हारी बारिश में बहुत उपजता हूँ...

मैंने तुमसे पूछा था
कि सबसे ज्यादा क्या पसंद है तुम्हें
और तुमने कहा था-
बारिश में भींगना

मैं तभी समझ गयी थी
कि तुम प्रेम-बीज हो
भींग कर, फूट कर,
अंकुरित होकर
लहलहा कर एक दिन भर दोगे मेरे जगत को

और ठीक वैसा हीं हुआ
मेरा ये जगत लहलहा उठा है

मैं  तभी तुम्हारे साथ चल पड़ी थी
हम घूमें बादल-बादल
उड़े आकाश-आकाश 

और फिर एक लाल सुर्ख शाम को
मैंने बारिश को
जब लिया था अपने आगोश में
तब तुमने भी अपनी बाहें खोल दीं थीं

मैं उपजाऊ बनी
और तुम लहलहाए

प्रेम अब और उपजता है
प्रेम की बारिश अब और होती है
और पता नहीं इन लहलहाते खेतों को क्या हुआ है
ये भी बढ़ते हीं जा रहें हैं
न ओर, न छोर !